Islam me aurat ki jindagi ke daur | इस्लाम के मुताबिक औरत की जिंदगी के दौर

कियामत के रोज हसरत  

बिस्मिल्लाह रहमान निर्रहीम 
फरमाने मुस्तफा सलल्लाहो तआला आलेहो वसल्लम सब से जियादा हसरत कियामत के दिन उसको होगी जिसे दुनिया में इल्म हासिल करने का मौका मिला मगर उसने हासिल न किया और उस शख्स को होगी जिस ने इल्म हासिल किया और दुसरो ने तो उस से सुन कर नफ़अ उठाया लेकिन उस ने न उठाया या नी उस इल्म पर अम्ल ना किया | 

औरत की जिंदगी के दौर  

औरत की जिंदगी के रस्ते में यू तो बहुत से मोड़ आते है मगर इसकी जिंदगी के चार दौर खास तौर पर कबीले जिक्र है 

1. औरत का बचपन 
2. औरत बालिग  बाद 
3. औरत बीवी बन जाने के बाद 
4. औरत माँ बन जाने के बाद 
अब हम औरत के इन चारों जमाने का और इन वक्तों में औरत के फराइज और इन के हुकूक का मुख़्तसर तजकिरा साफ़ साफ़ लफ्जों में तहरीर करते है | ताकि हर औरत इन हुकूक व फराइज को अदा करके अपनी जिंदगी को दुनिया में भी खुशहाल बनाए और आख़िरत में भी जन्नत की ला जवाल नेमतों और दौलतों से सरफराज हो कर माला माल हो जाए | 

1. औरत का बचपन  

औरत अपने बचपन में माँ-बाप की प्यारी बेटी कहलाती है इस जमाने में जब तक वह नाबालिग बच्ची रहती है शरीअत की तरफ से न उस पर कोई चीज फर्ज होती हे न उस पर किसी किस्म की जिम्मेदारियों का कोई बोझ होता हे वह शरीअत की पाबंदियों से बिलकुल आजाद रहती हे और अपने माँ-बाप की प्यारी और लाडली बेटी बानी हुई  कहती पीती पहनती ओढ़ती और हस्ती खेलती रहती हे और वह इस बात की हकदार होती हे की माँ-बाप भाई-बहिन और सब रिस्तेदार वाले उस से प्यार व मोहब्बत करते रहे  और उसकी सिह्हत व सफाई और उसकी आफीयत और भलाई में हर किस्म की इन्तिहाई कोशिश करते रहे ताकि वह हार किस्म की फ़िक्रों और रंजो से फ़रिगुल बाल और हार वक्त खुश व खुर्रम और खुशहाल रहे जब वह कुछ बोलने लगे तो माँ बाप पर लाजिम है कि उसको अल्लाह व रसूल अज्वाजल सलल्लाहो तआला आलेहो वसल्लम का नाम सुनाए फिर उस को कालिमा वगेरा पढ़ाए जब वह कुछ और जियादा समझदार हो जाए तो उस को सफाई सुथराई के ढंग और सलीके सिखाए उस को निहायत प्यार व मोहब्बत और नर्मी के साथ इन्सानी शराफ़तों की बातें बताएं और अछि अछि बातों का शौक और बुरी आदतों से नफरत दिलाएं जब पड़ने के काबिल हो जाए तो सब से पहले उस को कुरआन शरीफ पढ़ाएं | जब कुछ और जियादा होशियार हो जाएं तो उस को पाकि व नापाकी वुजू व गुस्ल वगेरा का इस्लामी तरीका बताएं और हर बात और हर काम में उस को इस्लामी आदाब से आगामी करते रहे | जब वह सात बरस की हो जाए तो उस को नमाज वगेरा ज़रूरियाते दीन की बातें तालीम करे और पर्दे में रहने की आदत सिखाएं और बर्तन धोने,खाने,पीने और छोटे छोटे घरेलु कामों का हुनर बताएं और अमली तौर पर उस से यह सब काम लेते रहे और उस की काहिली और बे परवाहि और शरारतों पर रोक टोक करते रहे और खराब औरतों और बद चलन घरानों के लोगो से मेल-जोल पर पाबन्दी लगा दें और उन लोगो कि सोहबत से बचते रहे    

2. औरत जब बालिग़ हो जाए 

जब औरत बालिग हो गई तो अल्लाह व् रसूल सलल्लाहो तआला आलेहो वसल्लम की तरफ से शरीअत के तमाम अहकाम की पाबन्द हो गई | अब उस पर नमाज, रोजा और हज व जकात के तमाम मसाइल पर अम्ल करना फर्ज हो गया है और अल्लाह तआला के हुकूक और बन्दों के हुकूक को अदा करने की वोह जिम्मेदार हो गई अब उस पर लाजिम हे की वोह खुदा के तमाम फर्जो को अदा करे और छोटे बड़े तमाम गुनाहों से बचती रहे | और यह भी उस के लिए जरूरी है की अपने माँ-बाप और बड़ों की ताजीम व खिदमत बजा लाए और अपने छोटे भाइयों बहनो और दूसरे अजीजो अक़ारिब से प्यार व मोहब्बत करे | पड़ोसियों और रिश्तेनाते के तमाम छोटों, बड़ो के साथ उन के मरातिब व दरजात के लिहाज से नेक सुलूक और अच्छा बरताव करे | अछि अछि आदतें सीखे और तमाम खराब आदतों को छोड़ दे और अपनी जिंदगी को पुरे तौर पर इस्लामी ढांचे में ढाल कर सच्ची पक्की पाबन्दे शरीअत और इमान वाली औरत बन जाएं और इस के साथ साथ म्हणत व मशक्कत और सब्रो रिजा की आदत डाले मुख़्तसर यह की शादी के बाद अपने उपर आने वाली तमाम घरेलु जिम्मेदारों की मालूमात हासिल करती रहे की शोहर वाली औरत को किस तरह अपने शोहर के साथ निबाह करना और अपना घर संभालना चाहिए वो अपनी माँ और बड़ी बड़ी औरतों से पूछ पूछ कर इस का ढंग और सलीका सीखे और अपने रहन-सहन चाल-चलन को इस तरह सुधरे और सवारे की न शरीअत में गुनहगार ठहरे न बरादरी व समाज में कोई इस को तना मार सके | 
खाने पीने,  पहनने ओढ़ने, सोने जागने, बात चीत गरज हर काम हर बात में जहा तक हो सके खुद तकलीफ उठाए मगर घर वालों को आराम व रहत पहुंचाए  | बगैर माँ-बाप की इजाजत के न कोई सामान अपने इस्तेमाल में लाए न किसी दूसरे को दे न घर का एक पैसा या दाना माँ-बाप की इजाजत के बगैर खर्च करे न बिगेर माँ-बाप से पूछे किसी के घर या इधर उधर जाए गरज हर काम हर बात में माँ की इजाजत और रजामंदी को अपने लिए जरूर समझे | 

3. औरत शादी के बाद 

निकाह :- जब लड़की बालिग हो जाए- बाप पर लाजिम हे की जल्द अज जल्द मुनासिब रिश्ता तलाश कर के उस की शादी कर दे | बुखारी व् मुस्लिम की की हदीष में है की खुद रसूलल्लाह सलल्लाहो तआला आलेहो वसल्लम ने फ़रमाया की औरत से शादी करने पर चार चीजे देख जाती है दौलतमंद, खानदानी शराफत, खूबसूरती, और दीन दारी लेकिन तुम दीन दारी को इन सब चीजों पर मुकद्दम समझो | 
औरत जब तक शादी नहीं होती वो अपने माँ-बाप की बेटी कहलाती है मगर शादी हो जाने के बाद औरत अपने शोहर की बीवी बन जाती है और अब उस के फराइज और उस की जिम्मेदारियां पहले से बहुत जियादा बढ़ जाती है वो तमाम हुकूक व् फराइज जो बालिग होने के बाद औरत पर लाजिम हो गए थे अब इन के अलावा शोहर के हुकूक का भी बहुत बड़ा बोझ औरत के सर पर आ जाता है जिस का अदा करना हर औरत के लिए बहुत ही बड़ा फरीजा है याद रखो की शोहर के हुकूक को अगर औरत ना अदा करेगी तो उस की दुनियावी जिंदगी तबाह और बर्बाद हो जाएगी और आख़िरत में वोह दोजख की भड़कती हुई आग में जलती रहेगी और उस की कब्र में सांप बिच्छू डसते रहेंगे और दोनों जहां में ज़लीलो ज़लीलो ख्वार और तरह तरह के अजाबों में गिरफ्तार रहेगी इस लिए शरीअत में हुक्म के मुताबिक हर औरत पर फर्ज है की वो अपने शोहर के हुकूक को अदा करती रहे और उम्र भर  शोहर की फरमा बरदारी व खिदमत गुजारी करती रहे |    

4. औरत माँ बन जाने के बाद 


औरत जब साहिबे अवलाद और बच्चों की माँ बन जाए तो इस पर मजीद जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ जाता है क्योकि शोहर और वालिदेन वगेरा के हुकूक के इलावा बच्चो के हुक्कोक भी औरत के सर पर सवार हो जाते है जिन को अदा करना हर माँ का फर्ज़े मंसबी है जो माँ अपने बच्चो का हक़ अदा नहीं करेगी यक़ीनन वो शरीयत के नजदीक बहुत बड़ी गुनहगार और समाज की नजरों में ज़लीलो ख्वार ठहरेगी हर माँ पर लाजिम है की अपने बच्चो से प्यार व मोहब्बत करे और हर मुआमले में उन के साथ मुश्फिकाना बर्ताव करे और उन की दिलजोई व दिल बस्तगी में लगी रहे और उनकी परवरिश और तर्बियत में पूरी पूरी कोशिश करे | 

1. अगर माँ के दूध में कोई खराबी न हो तो माँ अपना दूध अपने बच्चो को पिलाए कि दूध का बच्चो पर बड़ा असर पड़ता है | 

2. बच्चो की सफाई सुथराई  तंदुरुस्ती व सलामती का खाश तौर पर ध्यान रखे | 

3. बच्चो को हर किस्म के रंजो गम और तकलीफो से बचती रहे |

4. बच्चे जब कुछ बोलने लगे तो माँ को चाहिए की उन्हें बार बार अल्लाह अज्वाजल व रसूल सलल्लाहो तआला आलेहो वसल्लम का नाम सुनाए उन के सामने बार बार कालिमा पड़े यहां तक की उनको कालिमा शिखाए | 

5. बच्चो को इस्लामी अदब व अख़लाक़ और दीनो मजहब की बातें सिखाएं | 

नॉट - इस आर्टिकल का मकशद किसी भी जाती समुदाय या किसी भी मानव को ठेस पहुंचने का नहीं है आर्टिकल में सिर्फ और सिर्फ इस्लामिक औरतों की जिंदगी के दौर के बारे में बहुत सी प्यारी प्यारी जानकारियां दी गई है और कुछ ऐसी इस्लामिक बातें बताई गई हे जिन पर अम्ल करले तो जिंदगी बेहतरीन बन जाए | 

नाम - वसीम अल्वी 
मेल - meraislam765@gmail.com 

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